VED VIGYAN

मंदिर प्रोग्राम

सम्पादकीय—-
ॐ  नमश्चण्डिकायै
या श्री: स्वयं सुकृतीनां  भव नेष्वलक्ष्मी :
पापात्मनां  कृतधियां  हृदयेषु  बुद्धिः .
श्रद्धां  सतां  कुलजन प्रभवस्य  लज्जा
तां  त्वां  नतः  स्म  परिपालय  देवि  विश्वम .
भारत  देश  में  इसकी  ज्ञान  संपदा  की  अक्षुण्ण  शक्ति  सम्पन्नता  से  अभिभूत  यवन, राक्षस, दैत्य, दानव  तथा आसुरी  बुद्धि  की कलुषता  से  आततायी  बने  दुष्टों  ने  बाह्य  आक्रमण  कारियों  तथा घर भेदियों  के  रूप  में   इस  शक्ति  को  या  तो  हस्तगत  करने  या  इसे  तहस  नहस  करने  की  दृष्टि  से  इसमें  विविध  विद्रूपता  एवं  दोष  (Adulteration) भर  दिये  और  आज भी  भरते  चले  जा  रहे  हैं  तथा  स्वयं  इसे  या  इसके  सिद्धांतो  को  तोड़  मरोड़  कर  आम  श्रद्धालु  धार्मिक  सनातनी  जन समुदाय  को  इससे  घृणा  करने  एवं अधार्मिक  बनने  को  मजबूर  एवं  प्रेरित  कर  रहे  हैं.  और  यह सन्देश  प्रचारित  प्रसारित  कर  रहे  हैं  कि  यह सब  वेद  पुराण  एवं  ज्योतिष  कर्मकाण्ड  आदि  ढकोसला, पाखण्ड  एवं  एक  वर्ग  विशेष  का  ठगने  का  साधन  है.
पश्चात्ताप  का  विषय  यह  है  कि  इसके  उपदेश देने  एवं इसका  अति महत्त्व पूर्ण -उपयोगी  स्वरुप  जनता के  सामने  रखने  का  अधिकारी  कहने  वाले  इससे  विमुख  होकर  इन  आततायियों  के  चमक दमक प्रलोभन  एवं  व्यसन वासना पूर्ण  दिखावे  को  अपनी  परम्परा  मानकर  उसमें  ही  लिप्त  होते  चले  जा  रहे  हैं. और  इन  वैदिक , पौराणिक, पारंपरिक  एवं  सनातनी  सिद्धांतो  के  शाश्वत  सत्य एवं सुदृढ़  मूल  रूप  से  स्वयं  ही  हीन  होते  चले  जा  रहे  है  जब  कि इसकी  सर्वोच्चता  से  प्रभावित  होकर  ये  आततायी  इसे  ग्रहण  करते हुए  इसकी  तरफ  झुकते  चले  जा  रहे  हैं.
विदेशों  में  वेद-पुराण तथा  उपनिषद्  पर  हो  रहे  नित  नये  अनुसंधान  एवं  उसके चमत्कार से  चमत्कृत  ये  इतर भारतीय  हमसे  यह  समृद्ध  ज्ञान  छीन  कर  उच्च, समृद्ध  एवं  सुखी  बनते  चले  जा  रहे  हैं  तथा  हम  अपने  ही  ज्ञान  की  भीख  इनके  सामने  अपनी  झोली  फैलाकर  मांगने  को  विवश  होते  चले  जा  रहे  हैं.
आज  हम इन देशों से  वे  औषधियां  अत्यंत  ऊँची  कीमत  पर  खरीदने  को  मजबूर  हैं  जिनके  निर्माण  का  सिद्धांत  हमारा  है  और  प्रयास  उनका है.  हमारी सभ्याता-संस्कृति  को  सर्वोच्च  मानकर  ये  विदेशी, यवन, आततायी  एवं  इतर सनातनी  उसे  अंगीकार  करते हुए  आगे  बढ़  रहे  हैं  और  हम  उनकी  पापपूर्ण, दूषित  एवं अधार्मिक  क्रिया एवं  व्यवहार  को  अपनाकर  अपने, अपने  परिवार, समाज  और  पूरे  राष्ट्र  को  घिनौना  बना रहे  हैं.
मैं  भारतीय  सेना  का  एक  सक्रिय  सेवारत  सिपाही  हूँ. भारत  की  सर्वोच्चता  जो  उसकी  ज्ञान, संपत्ति  एवं  आर्ष  परम्परा  के संबल  पर सदा  आलोकित  रही है, उससे  अभिभूत  होकर मैंने  अपना  समस्त  जीवन – जोकुछ  करने  लायक  था  अर्थात  25 वर्ष  की  आयु  से  लेकर  60  वर्ष  तक  का  जीवन  इस  माँ भारती  के  चरणों  में  समर्पित  कर  दिया. यद्यपि  मैं  खैबर दर्रा,  जोजिला,  ग्लेशियर के अति  उत्कट  एवं  भयावह  कंदराओं  से  लेकर  काश्मीर  के बीहड़   पीर पांचाल ,  डोडा,  लेह लद्दाख  और  अरुणांचल  की सीमा  से  लगे  भयावह  बर्मा,  थाईलैंड  आदि  की  अगम्य  पर्वत  श्रृंखलाओं  में  भ्रमण  करते  हुए  अनेक  घोषित  एवं  अघोषित  युद्ध  (Proxy  War) लड़ा  हूँ.  अपने  हथियार  से  कई  एक  दुश्मन  आततायियों  को  यमपुरी  भेज  चुका  हूँ.  किन्तु  मूल  रूप  से  मैं  भारत  के  प्रसिद्द  एवं  एशिया  महाद्वीप  की  एक मात्र  एवं अति प्रतिष्ठालब्ध  शिक्षण संस्था  ‘काशी  हिन्दू  विश्वविद्यालय  (BHU)’  से  जैव  रसायन  में  सर्वोच्च  उपाधि  प्राप्त  कर  चुका  हूँ.  जिससे  मुझे  ज्ञात  है  कि  किस  तरह  से  प्राचीन  वैदिक  ज्ञान  का  अनुसरण,  अनुकरण  एवं  उसकी  अविचल  सुदृढ़ता  का  पालन  इस  आधुनिक  विज्ञान  द्वारा  किया  जा  रहा  है  तथा  नाम  वेद  पुराण  का  नहीं  बल्कि  इन  अंग्रेजी  या विदेशी  संस्थाओं  एवं  विधाओं  का  हो  रहा  है.  इसके  अलावा  इसमें  बहुधा  गैर सनातनी  सिद्धांतो, परम्पराओं  एवं  संहिता  को  भरते  चले  जा  रहे  हैं.
उदाहरण  के  लिये मैं  एक  अत्यंत  प्रचलित  औषधि  का  उल्लेख  कर  रहा  हूँ. एक  औषधि  है  Surpentina.  इसे  साराभाई  केमिकल्स  नामक  एलोपैथिक  कंपनी  बनाती  है.  यह  सर्पगंधा  से  बनाई  जाती  है.  यूनानी  कंपनी  इसे  सरबाइना  नाम  से  बनाती  है.  यह  ठीक  है  कि  इसमें  सर्पगंधा  का  मूल  सत  ही  प्रधान  होता  है  जिसे  एलोपैथी  में  Metachloractidin raencimide कहा  जाता  है. या इसका  परिष्कृत  नाम  Acitic Malathinic Saliciamide या  Acitic Salicilic Acid है.  जिससे  Disprin या  पैरासिटामोल  बनाने  में  सहयोग  लिया  जाता  है.  किन्तु  अभी  एलोपैथिक  चिकित्सा विज्ञान  में  ऐसा  कोई  द्रव  या  यौगिक  नहीं  बनाया  गया  है  जिससे  सर्पगंधा  के  मूल  शांतिकारक  तत्व (Tranquiliser) को  बिना  केन्द्रीय  तंत्रिका  तंत्र  (Central  Nerves  System) को  क्षति  पहुंचाये  उसका  प्रयोग  कर  सके. इसके  लिये  एलोपैथिक  चिकित्सा  विज्ञान  इसमें  Dyrentaclin Hydrolactamide का मिश्रण  कर देता है. जिससे  ह्रदय  का  बायाँ  निलय  (Ventricle) अपने  मृदुकान्त  अवलेह  से  हीन  हो  जाता  है.  और  मनुष्य  आकस्मिक  हृदयाघात  (Heart Attack)  या  किडनी  फेलर  का  शिकार  बन  जाता  है.  जब  कि  आयुर्वेद  में  इसमें  तुलसी या  सहिजन  या  कोदो  या  जलधान  के  मांडी  को  मिला  दिया  जाता  है या विशेष  अवस्थाओं  में   वत्सनाभ  जैसा  निरापद  पदार्थ  आवश्यकतानुसार  मिला दिया  जाता  है  जिससे  व्याधि  का  नाश  तो  होता  ही  है  निलय  एवं किडनी  को  ज्यादा  मजबूती  भी  मिल  जाति  है  या  दूसरे  शब्दों  में  आयु  में  वृद्धि  भी  हो  जाती  है.
दूसरा  उदाहरण  एलोपैथिक  दवा  Rodrix  का  लेते  हैं.  यह  मूल  रूप  में  रुद्राक्ष  के  अभिरुन्ध्रक  पदार्थ  जिसे  आधुनिक  चिकित्सा  विज्ञान  में  Sulphamethaxiol Syntradin कहा  जाता  है, उससे  बनता  है. इसे  उद्वेलित  या सक्रिय  करने  के  लिये  एलोपैथी  में  Dyphostomonol Rigradiasin आदि  इस्तेमाल  किया  जाता  है. इससे भी  यकृत  एवं  पित्ताशय  जख्मी  होता है.  क्योकि  फास्फोरस  एवं गंधक  अपने नुकीले  क्रिस्टलिक  किनारों  से  यकृत  एवं पित्ताशय  को  चीर  डालते  हैं. और मनुष्य  और ज्यादा  व्याधिग्रस्त  हो  जाता  है. जब  कि आयुर्वेद  में इसके  साथ  शंख  या  मूंगा  के  भस्म  का  प्रयोग  किया  जाता  है.
यही  कारण  है  कि  मैं  इसका  ज्ञान  लोगो  तक  पहुंचाकर  उन्हें अपनी  आयु, ज्ञान, ख़ुशी  एवं समृद्धि बढाने  की  सम्मति  देना  चाहता हूँ.
इस  वेब साईट  के  माध्यम  से  वेद, पुराण, उपनिषद्, साहित्य  एवं  श्रुति  स्मृति  में  वर्णित  अनेक  ज्ञान  वर्द्धक  एवं  मानव  जीवन उपयोगी  तत्वों  को  लोगो  तक  पहुंचाना  मेरा  उद्देश्य  है  तथा  इस  की  आलोचना  एवं  निंदा  करने  का  कार्य  जो  लोग  पैसे  के  लोभ  में  अनेक  अंतर्राष्ट्रीय  एवं गैर  सनातनी  कंपनियों  एवं संस्थाओं  – मिशन  आदि  से एजेंट  के  रूप  में  धन  लेकर  करते  हैं, उनसे  लोगो  को  सचेत  करना है.
अनेक  लोग  ऐसी  कंपनियों  एवं  मिशनरियों  का  एजेंट  बने  हैं  तथा  उनका  काम  है  टीवी, सोशल मीडिया  तथा समाचार  पत्रों  में  मनगढ़ंत  तथ्यों एवं सिद्धांतो  तथा  झूठे  उदाहरणों के  आधार  पर  इन  वैदिक-पौराणिक  परम्पराओं  के  खिलाफ  प्रचार  करना. इसके लिये  उन्हें इन कंपनियों  मिशनरियों  से  उचित  कमीशन मिलता  है. और मैं  केवल  इस  वेबसाईट  के  माध्यम  से  ऐसे लोगो  से सचेत  एवं सावधान  रहते  हुए  आम जनता  को  इस अति समृद्ध  वैदिक संपदा  के  ज्ञान  से  परिचित  करा  रहा  हूँ.
मैं कोई  वैद्य  नहीं, कोई  ज्योतिषाचार्य  नहीं  या  किसी  दवा कंपनी  का  मालिक या  कार्यकर्ता  नहीं  हूँ.  मैं  अक्षुण  सनातनी  ज्ञान  संपदा  का  उपासक  एवं  अनुयायी हूँ.  और  अपनी जीवन  वृत्तिका  चलाने  के  लिये भारत  के  सम्मानित  संगठन  भारतीय  सेना से प्रचुर वेतन पा जाता हूँ. मेरे पास जजमानी या झाड फूंक  करने  का  कोई व्यवसाय नहीं है.
और इसीलिए फेसबुक एवं दैनिक जागरण के अलावा जागरण जंकशन पर प्रकाशित मेरे लेख पर अनेक आलोचना एवं गाली मिलती है. क्योकि इससे अनेक लोगो के व्यवसाय चौपट हो गए है.
अस्तु , मैं अपना कार्य कर रहा हूँ. इसकी उपयोगिता एवं इसका महत्त्व सुधी पाठकों द्वारा निर्णीत एवं निर्धारित किया जाएगा.
इसी आशा एवं विश्वास के सहारे-
जगदीश्वरी चरणानुयायी
पंडित  आर  के  राय
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